"आईने की चाह भी बड़ी खूबसूरत सी होती है " सब को एक नजर से देखने की चाह में
वो खुद को इतना मशगूल रखता है प्कि चाह कर भी कभी सच नही बोल पाता ।।
हजारो दफ़ा खिलते चहरे तो कभी मंद मुस्कुराहट लिये रचना मुस्कुरा रही होती है
चहरे पर अलग अलग भाव लिये उसका बचपन मेरे साथ ही बीता है
आइना - बचपन मन्द मुस्कुराहट के साथ मैं सोचता हूँ कि ये बचपन ठीक रहा कि मेरी जवानी ।।
मैं अक्सर रचना को यहीँ से देखा है ।
रचना का जन्म कब हुआ ये तो ठीक से याद नही ........
बस बाबा थे जो मेरे छोटे कद काठी के खिलाफ थे उन्हें लगता था तराशबीन की जरूर कोई मजबूरी रहती होगी जो मुझे आके ले के जायेगा।।
ओर अम्बे माँ की कृपा से एक दिन बाबा भी चल बसे ... दुख तो बहुत हुआ मगर ईसा की कृपा से में अब अपनी मिलकियत का इकलौता वारिस था और भी दूर दराज मैं भाई बन्द थे मगर अब मैं इकलौता था कहने को ।।
खेर में रचना के संग खुश था रचना मुझे रोज अपने किस्से सुनाया करती थी । मेरी ओर रचना की उम्र में कोई ज्यादा फर्क नही है महज कुछ लम्हो का ।।
(एक आइने की सही उम्र उसके बंनने से नही पहली दफ़ा उसमे कोई अपनी मुस्कुराहट देखे तभी से शुरू होती है )
जब वो ठीक से बोल भी नही पाती थी तभी मैंने उसे प्यार किया, अब्बा कहते थे हमे लोग अपने मतलब के लिए चुनते हैं ओर मैं कहता था नही ऐसा नही है हम लोगो को चुनते हैं उन्हें उनकी रूह से मिलाते है , इसीलिये तो परवर दिगार ने हमे चुना है
जहॉं भी रचना को कोई मलाल हो रास्ता न मिले मैं मगरूर रचना को रचियता से मिलवा दूँ ।।
घर में कोई दूसरा बच्चा नही था वो अकेले सम्राज्य की मालकिन बन सब को दौड़ती थी अपने पीछे पीछे ।।
रचना की माँ आफिस जाया करती थी तभी वो मेरे करीब टिकी बिंदी लाली लगाये मुस्कुराती थी ......और फिर शर्म का घूंघट न जाने कहाँ देख आई थी चुलबुली सी रचना ।।
आहिस्ता आहिस्ता कब बड़ी होने लगी उसे तो पता भी नही चला और मैं बस दिन रात यही जुगत मैं रहता था कि मेरी रचना को क्यों बड़ा कर दिया ।।
खेर अब वो हाइस्कूल में जाने लगी थी वहां के लिये तैयार होने लगी थी । कब छोटी रचना का कद बढ़ गया पता ही नही लगा ।।
मैं छोटा पड़ने लगा था
खेर अब मेरी जगह आँगन से उठ कर रचना के भीतर वाले कमरे में थी ।
फिर एक दिन अचानक मेरे अब्बा के जितना बड़ा रहा होगा वो उसके कमरे में आ गया था । तो मुझे मेरी जगह बाथरूम के एक कोने में दिखाई दी गई थी ।।
वैसे मैं वहां ख़ुश था सुन कर अचंभा होगा तुम्हे........
लेकिन जैसे बचपन वो सिर्फ मुझे अपनी कहानियां बताया करती थी वैसे ही आज भी मैं उसकी कहानियों का हिस्सा हूँ ब्रश करते हुए...तैयार होते हुए ....मुझे अपनी मन की कहानियों के किस्से गा के सुनाती थी ।
(भला ये किस्म्मस्त भी कोई चीज रही होगी वरना हम एक तरफा प्यार की कहानियों में हमे कौन प्यार के नगमें सुनता है हमे तो बस लोग अपनी किस्मत की खूबसूरती को निहारने के लिए मात्र चुनते हैं .खेर खुश होने को मिजाज नही बस वक्त होता है साथ )
मेरी रचना थी बहुत सादी , बड़ी सादगी से मैने उसके ख्वाबो को पलते देखा था।
कई दफा उसकी चचेरी मेमरी बहनों ने मेरे अंदर झांका ओर मैं स्तब्ध था ।।
ओर मुझे भी यही तो पसन्द था उसकी कुछ आदतों में से एक *काजल लाली लगा के मुझ बेबस से पूछना बतातो सब ठीक है ना ओर फिर हर बार की तरह खुद से जवाब देना
वो बोलती चली जा रहा थी शायद आज कोई खास दिन होगा तभी वो दस दफ़ा देख चुकी थी ।।
खेर गाड़ी का हॉर्न बजा ओर वो चली गई ।।
मैं सुन नही पाया माँ शायद उसे रोक रही थी या कुछ और पहन के जाने को कह रही थी मैं ठीक से समझ नही पाया ।।
वो अकसर पनडुब्बी सी डूब जाया करती थी पानी बेहद गर्म रहता था अक्सर मेरे चेहरे पर उस पानी की तलछटी सी बनती थी ..
पनडुब्बी अक्सर बाहर निकल कर मेरे चेहरे पर अपने नाम लिखती थी...
वो कभी निर्वस्त्र नही थी....
लाज लजा के संग लिपटी हुई अपने अंदर खुशी का बवंडर समेटे थी मेरी रचना कभी बेपर्दा नही हुई थी .......
वक अक्सर बेपर्दा होती भी तो मेरी आँखों पर तलछटी होती थी ,सर्दी हो या गर्मी वो पनडुब्बी बन अक्सर ये तलछटी बनाया करती थी ।
जाड़े की इस रात में नजाने क्या हुआ था
की वो डूबी तो सही मगर वापस नही लौटी कुछ देर तक ।।
मेरा मन विचलित था ......
रचना एक मन एक की साफ शैली सी है जिसकी भावना समुद्र सी गहरी लहरो सी चंचल ,अथाह पीड़ा का बवंडर ,खुशियों का समंदर ,कभी रेत सी मुलायम तो कभी हवा का ओझल साया मन से टकराते हुए शरीर से आत्मा को चीरते हुये
सुंदर नजर ,कोई पढ़े तो बे पर्दा सी नज्म ।।
बहती हुई सांस , निर्लोभी रचना कानो को चीरते हुए सर सर सन्नाटे सी रचना।।
एक एकेली पतवार जिसकी डोर का सिरा उस पार बिना खूँटे से बंधा एक छाया चित्र सा है
मेरे लिए तो केवल मात्र मैं कभी उस से मिला नही ।।
जिसके छूने मात्र से मेरी रचना आज डुब्बी ओर लौटी नही ।।
ये सब मेरे लिए भी उतना ही नया है जितना रचना के लिये ।।
यूँ तो रोज लोग मुझ से ढेर बतिया लिया करते है .....हमारे बीच के सवांद एक तरफा होते है .....
#स्वलिखित #रचना #आइना अगला हिस्सा फिर कहीं किसी मुलाक़ात के साथ
तस्वीर खुद से खुद की मुलाक़ात के सिलसिलेवार हिस्सों की
तस्वीर ... कहानी से मैच नही होती मगर आइना ये खुशगवार गुजरा ...... २२.१.२०१८
