1/22/2018

आइना भाग 1

रचना और आइना भाग प्रथम 

"आईने की चाह भी बड़ी खूबसूरत सी होती है " सब को एक नजर से देखने की चाह में
वो खुद को इतना मशगूल रखता है प्कि चाह कर भी कभी सच नही बोल पाता ।।

हजारो दफ़ा खिलते चहरे तो कभी मंद मुस्कुराहट लिये रचना मुस्कुरा रही होती है
चहरे पर अलग अलग भाव लिये उसका बचपन मेरे साथ ही बीता है
आइना -  बचपन मन्द मुस्कुराहट के साथ मैं सोचता हूँ कि ये बचपन ठीक रहा कि मेरी जवानी ।।
 मैं अक्सर रचना को यहीँ से देखा है ।
रचना का जन्म कब हुआ ये तो ठीक से याद नही ........
अब्ददुल अब्बा कह गए थे बाबा से की तेरा बेटा जरूर एक दिन कमाल करेगा ओर बाबा कहते रहे इसकी ऐसी किस्मत कहाँ.......

अब्बा हुजूर ने कभी मुझ में ओर बाबा में फर्क नही किया ।।
बस बाबा थे जो मेरे छोटे कद काठी के खिलाफ थे उन्हें लगता था तराशबीन की जरूर कोई मजबूरी रहती होगी जो मुझे आके ले के जायेगा।।
ओर अम्बे माँ की कृपा से एक दिन बाबा भी चल बसे ... दुख तो बहुत हुआ मगर ईसा की कृपा से में अब अपनी मिलकियत का इकलौता वारिस था और भी दूर दराज मैं भाई बन्द थे मगर अब मैं इकलौता था कहने को ।।
खेर में रचना के संग खुश था रचना मुझे रोज अपने किस्से सुनाया करती थी । मेरी ओर रचना की उम्र में कोई ज्यादा फर्क नही है महज कुछ लम्हो का ।।

(एक आइने की सही उम्र उसके बंनने से नही पहली दफ़ा उसमे कोई अपनी मुस्कुराहट देखे तभी से शुरू होती है )

रचना की अम्मी  उस रोज मुझे मेले से रचना की जिद पर ख़रीद लाई थी , तब से मैं ही तो हूँ उसका अक्श उसकी आवाज उसकी चाहत उसकी मासूमियत को तरार होते देखने वाला मैं ही तो हूँ
जब वो ठीक से बोल भी नही पाती थी तभी मैंने उसे प्यार किया, अब्बा कहते थे हमे लोग अपने मतलब के लिए चुनते हैं ओर मैं कहता था नही ऐसा नही है हम लोगो को चुनते हैं उन्हें उनकी रूह से मिलाते है , इसीलिये तो परवर दिगार ने हमे चुना है

जहॉं भी रचना को कोई मलाल हो रास्ता न मिले मैं मगरूर रचना को रचियता से मिलवा दूँ ।।

बाबा हंसी में टाल देते थे कहते थे अच्छा बहुत खूब भली हो तुम्हारी तुम्हे सच में  बातें बड़ी आती हैं ओर फिर मैं चुप हो जाता ....आज बाबा की ये बातें क्यों दोहरा रहा हूँ पता नही ।।
रचना का बचपन तो माँ के सानिध्य में बीता स्कूल जाते समय दो चोटी बनाकर मुस्कुराया करती थी । स्कूल से लौट कर मेरे सामने रखे मेजबान दस्ते पे बैठ खाना खाया करती थी ओर मन हुआ तो मुझे भी पूछ लिया करती थी ।।
घर में कोई दूसरा बच्चा नही था वो अकेले सम्राज्य की मालकिन बन सब को दौड़ती थी अपने पीछे पीछे ।।
रचना की माँ आफिस जाया करती थी तभी वो मेरे करीब टिकी बिंदी लाली लगाये मुस्कुराती थी ......और फिर  शर्म का घूंघट न जाने कहाँ देख आई थी चुलबुली सी रचना ।।
आहिस्ता आहिस्ता कब बड़ी होने लगी उसे तो पता भी नही चला और मैं बस दिन रात यही जुगत मैं रहता था कि मेरी रचना को क्यों बड़ा कर दिया ।।
खेर अब वो हाइस्कूल में जाने लगी थी वहां के लिये तैयार होने लगी थी । कब छोटी रचना का कद बढ़ गया पता ही नही लगा ।।
मैं छोटा पड़ने लगा था
खेर अब मेरी जगह आँगन से उठ कर रचना के भीतर वाले कमरे में थी ।
फिर एक दिन अचानक मेरे अब्बा के जितना बड़ा रहा होगा वो उसके कमरे में आ गया था । तो मुझे  मेरी जगह बाथरूम के एक कोने में दिखाई दी गई थी ।।

वैसे मैं वहां ख़ुश था सुन कर अचंभा होगा तुम्हे........
लेकिन जैसे बचपन वो सिर्फ मुझे अपनी कहानियां बताया करती थी वैसे ही आज भी मैं उसकी कहानियों का हिस्सा हूँ ब्रश करते हुए...तैयार होते हुए ....मुझे अपनी मन की कहानियों के किस्से गा के सुनाती थी ।
(भला ये किस्म्मस्त भी कोई चीज रही होगी वरना हम एक तरफा प्यार की कहानियों में हमे कौन प्यार के नगमें सुनता है हमे तो बस लोग अपनी किस्मत की खूबसूरती को निहारने के लिए मात्र चुनते हैं .खेर खुश होने को मिजाज नही बस वक्त होता है साथ )

मेरी रचना थी बहुत सादी , बड़ी सादगी से मैने उसके ख्वाबो को पलते देखा था।
रचना को शायद किसी से प्यार हो गया था या उसकी ज़िन्दगी में कोई था ,जो घर का मालूम न होता था । वो अक्सर आधी रात में उठकर मेरे पास आती कुछ मुस्कुराती ओर अपने बालों के साथ इठखेलिउयाँ  करती
मैं बस उसे यूँ ही घूरता रहता ।।
वो ख़ुश थी बातें करती थी और रोज नए कपड़ो में मनमोहनी सी बन निकल पड़ती थी ।।
सुंदर तो थी ही बला की खूबसूरत ऐसी घर में ओर कोई न थी  ।
कई दफा उसकी चचेरी मेमरी बहनों ने मेरे अंदर झांका ओर मैं स्तब्ध था ।।
रचना ने कभी ऐसा नही किया था वो बस अपनी मुस्कुराहट लिए मुझे देखती थी
ओर मुझे भी यही तो पसन्द था उसकी कुछ आदतों में से एक *काजल लाली लगा के मुझ बेबस से पूछना बतातो सब ठीक है ना ओर फिर हर बार की तरह खुद से जवाब देना
अरे हां यार सब ठीक ही तो है देखो तुम हो ही खूबसूरत तुम्हे तो सब आता है तुम कायनाथ की खूबसूरत हसीन खुंश किस्मत नूर हो ।।
वो बोलती चली जा रहा थी शायद आज कोई खास दिन होगा तभी वो दस दफ़ा देख चुकी थी ।।
खेर गाड़ी का हॉर्न बजा ओर वो चली गई ।।
मैं सुन नही पाया माँ शायद उसे रोक रही थी या कुछ और पहन के जाने को कह रही थी मैं ठीक से समझ नही पाया ।।
आज रचना ने कुछ अलग पहना था वो कह रही थी गुलाबी रंग उस पे फबता है.. सही भी है मुस्कुराहट के साथ......
वो लौट के आई और गुस्से में थी शायद मुझ से मिली नही बस आते ही पानी के जहाज में लेट गई .. अरे पानी का जहाज जिसमे
वो अकसर पनडुब्बी सी डूब जाया करती थी पानी बेहद गर्म रहता था अक्सर मेरे चेहरे पर उस पानी की तलछटी सी बनती थी ..
पनडुब्बी अक्सर बाहर निकल कर मेरे चेहरे पर अपने नाम लिखती थी...
तो कभी अपने गुलाबी होठों से मुझे चूमा करती थी......
कभी अपनी गीली लटों को अपनी अंगुलियों में घुमाया करती थी.......
वो कभी निर्वस्त्र नही थी....
लाज लजा के संग लिपटी हुई अपने अंदर खुशी का बवंडर समेटे थी मेरी रचना कभी बेपर्दा नही हुई थी .......
वक अक्सर बेपर्दा होती भी तो मेरी आँखों पर तलछटी होती थी ,सर्दी हो या गर्मी वो पनडुब्बी बन अक्सर ये तलछटी बनाया करती थी ।
जाड़े की इस रात में नजाने क्या हुआ था
की वो डूबी तो सही मगर वापस नही लौटी कुछ देर तक ।।
मेरा मन विचलित था ......


रचना एक मन एक की साफ शैली सी है जिसकी भावना समुद्र सी गहरी लहरो सी चंचल ,अथाह पीड़ा का बवंडर ,खुशियों का समंदर ,कभी रेत सी मुलायम तो कभी हवा का ओझल साया मन से टकराते हुए शरीर से आत्मा को चीरते हुये
बहने उड़ने ओर गहराई में उतरने को तत्पर रचना
सुंदर नजर ,कोई पढ़े तो बे पर्दा सी नज्म ।।
बहती हुई सांस , निर्लोभी रचना कानो को चीरते हुए सर सर सन्नाटे सी रचना।।
एक एकेली पतवार जिसकी डोर का सिरा उस पार बिना खूँटे से बंधा एक छाया चित्र सा  है 
मेरे लिए तो केवल मात्र मैं कभी उस से मिला नही ।।
जिसके छूने मात्र से मेरी रचना आज डुब्बी ओर लौटी नही ।।
एक शोर आहट लम्बी सांसो का ओर आंसुओ का शोर ,ओर वो लम्बी सुबकियां ये सब पहले  कभी नही सुना था ।।
ये सब मेरे लिए भी उतना ही नया है जितना रचना के लिये ।।
यूँ तो रोज लोग मुझ से ढेर बतिया लिया करते है .....हमारे बीच के सवांद एक तरफा होते है .....

#स्वलिखित #रचना #आइना अगला हिस्सा फिर कहीं किसी मुलाक़ात के साथ
तस्वीर खुद से खुद की मुलाक़ात के सिलसिलेवार हिस्सों की
तस्वीर  ... कहानी से मैच नही होती मगर आइना ये खुशगवार गुजरा ...... २२.१.२०१८

12/08/2017

"करीब करीब सिंगल" मूवी रिव्यु

तनुजा चंद्रा के निर्देशन में बनी करीब करीब सिंगल एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है।
 फिल्म में इरफान के कंधे कॉमडी का जोड़ है , तो इमोशनल फ़ैवीकोल पार्वती के हाथ में है।
कहानी मुझे थोड़ी हटकर लगी इस फिल्म में मुझे टिपिकल बॉलीवुड वाली लव स्टोरी देखने को नहीं मिली
जिसमें हीरो और हिरोइन एक-दूसरे के प्यार में डूबे हुए नजर आतें हो i love you ... जैसे जीने-मरने की कसमें खाते हों ।
फिल्म की कहानी जीना सिखाती है , यही वजह है की एक यूनिक स्टोरी है , जो हर पल मुझे हंसाती है ।
कहानी खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी हुई है जिससे कि आप मेरी तरह खुद को कनेक्ट कर पाएंगे क्योंकि आम लव स्टोरी भी हाफुसआम जैसी नही होती ।
इसकी कहानी आज के युवाओं को शायद कुछ एक जगह ही पसन्द आएगी
 इरफान का बार बार ये कहना  "आम को जब तक चूसा नही स्वाद नही  "आम न हो मानो ...... खेर फ़िल्म में हर बात के दो मतलब होते है । दर्शक की नजर अभी ज़िन्दगी के मजे आम को चूसने जैसे शब्दो पर एक अजीब सी गन्द पैदा करनी वाली स्थिति पर आतंकी होती है , डेटिंग एप्स राइट लेफ्ट की स्टोरी पर जब युवा हो तो वो प्यार के कुछ एक बुनियादी एहसासों को भूलना स्वाभाविक से हो गया है । डेटिंग एप्स की कहानी का सार इस तरह भी हो सकता है ।
खेर कहानी की बात करुँ तो ये योगी यूपी वाले नही ...... (इरफान खान) और जयश्री (पार्वती) की रोड ट्रिप वाली लव स्टोरी है। दोनों की मुलाकात ऑनलाइन डेटिंग वेबसाइट के जरिए हुई है ।
इसके बाद एक-दूसरे को जानने और समझने के लिए दोनों मिलें योगी ऐसा लड़का जो चुलबुल से व्यवहार में है , चिल पिल टाइप जबकि जया ने अपनी ज़िंदगी काम में लगा रखी है दोनों की पहली मुलाकात कॉफी पर हुई जहां योगी हंसी-मजाक करने की कोशिश करते हैं जो जया को पसंद नहीं आया ,
“दो लाते (कॉफी) लाओ, लाते लाना अपनी लातें मत ले आना...”
इसके बाद दोनों ऋषिकेश, अलवर , जयपुर और गैंगटोक की यात्रा साथ में करते हैं। यात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । जहॉं योगी की इस यात्रा का उदेशय अपनी इश्क की कहानी को जया से मिलवाने का होता है ।
घनघोर इश्क “टोटल तीन बार इश्क किया और तीनों बार ऐसा इश्क मतलब जानलेवा इश्क, मतलब घनघोर हद पार..... घनघोर शब्द नही हलचल है ....
वहीं जया का कोई उद्देश्य नही है यात्रा का बस कुछ नया ओर नई उम्मीद के साथ ही , आस पास से दुखी होकर साथ चलने वाली यात्रा है रही । साथ ही मन में उम्मीदों के समुद्र को समेटे , न बहने देने वाली चाहत , जैसे बह गई तो मानो व्व खुद ही डूब जायेगी ....... कुछ तो है जो उसे बढ़ने नही देता ।
कहानी और कहानियों से भेहद अलग है जैसे टिव्टर वाले पोस्ट कम शब्द अधिक भावना ।
तो यहां भी ऐसा है , समय कम खिंची हुई सी ,
चुलबुल रोल, इरफान का शुरू से लेकर अन्त तक आपको कुर्सी से उठकर हँसाने वाले अंदाज , या जयश्री का शांत चिड़चिड़ाहट वाला स्वभाव ,खुद से खुद की मुलाकात करवाता है ।
आप कहीं भी हो अच्छे की तलाश यात्रा से बेहतर नही हो सकती ।
फ़िल्म की खासियत ये है ,  सलाह की वो पासवर्ड को बदलते रहने कीदेती है , ओर सच है ये
एक ही चीज की अहमियत रखते रखते
हम टूट जाते है । बदलाव जरूरी है खुद के लिए।
जो सबसे अच्छा था वो था पास्ट ओर फ्यूचर का ब्लॉक होना ।
आज है ...जो है , बीता जो जमाना था.... कल जो होगा..... वो किसने देखा... जो है आज है , इस बार गाड़ी नही छूटनी चाहिये । 
जो छूट गई तो गम नही ....बीता जो जमाना होगा .... कल क्या होगा किसने देखा ।
जरूर जाएं जिन्हें लगता है बस अब कुछ नही रहा ,ज़िन्दगी खत्म है , फिर से कुछ शुरू हो जाएगा , यात्रा की शुरुवात करें ।थोड़ा सा
#खुदसेखुदकीमुलाक़ात करें ।
यात्रायें ज़िन्दगी को नए मोड़ पे लाती है , जब भी दोराहे वाले मोड़ से खयालो की कश्ती को डूबते देख रहें हो यात्रा कर लें । लौटते वक्त जिस मोड़ से चले थे उस से अलग मोड़ पे पाएंगे खुद को । हर मोड़ के बाद कुछ देर के लिए सीधे रास्ते बनते है , चलते रहना चाहिए रुक कर समय बर्बाद करना खुद से खुद को तबाह करने सा है ।

11/20/2017

19 Nov पुरुषो का दिन

Happy international men's day 😇
ज़िन्दगी की कलम से भाग 1

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज पुरुषो का दिन है ।
बधाई हो उन सभी को जो पुरुष है मेरी ज़िंदगी में उन्हें भी जो नही है , उन्हें भी ।
पिता से शुरू करूँ तुम मेरे प्रिय हो तुमसे मैंने जन्म लिया है , तुमसे शुरू होकर में से .....मैं का सफर बनाया है मैंने | तुम्हें पुरषो वाला ये दिन मुबारक हो ।

मैंने रोते बिल्खतें पुरुषो में से एक तुम्हे देखा है ,आज तुम्हे ख़ुद में ख़ुद से देखा है ।
कहने को तुम आदमी हो , आदम हो कहते है
मर्द रोते नही , मैने तुम्हे तिल तिल तड़पडते देखा है
उनकी सिसकियाँ सरे बाजार नही बिकती , मैंने तुन्हें बिकते देखा है ।
मर्द अक्सर टूट जाया करते है , ओर हम उन्हें आदम बना जोड़ देते है ।
उंनकी सिसकियाँ नामर्दो की बारात में गिनती कर हम जुलूस निकाला करते हैं
मर्द को दर्द नही होता ,  ये कहकर हम ठहाके लगवयां करते हैं ...

तुम्हे पुरुष हो ऐसी नजरों से मैंने कभी देखा नही
एक स्वांग सा है रिश्तो  का तुम्हे तुम सा किसी ने देखा नही
तुम्हे तुम से रहने दे कोई ऐसा किसी ने सोचा नही
तुम्हारी खूबसूरती का किस्सो का फतवा किसी ने गढ़ा नही ।

तो आओ तुम्हे भी तुम सा रहने देने की एक कोशिश करती हूं ।
पिता को भूल पुरुष से मुलाकात करती हूँ ।

कुछ बुनती हूँ किस्सो से , कुछ गढ़ती हुँ हिस्सो से
कुछ तुम में भी खास है , जिसकी कल्पना मात्र से तुम्हारी खूबसूरती मेरी आँखों में उतर आई है।

तुम मम प्रिय पौरुष पुरुष

तुम्हारा कद उस चोटी सा है , जिसकी जड़ें धरती से जुड़ी है
तुम्हारा सुंदर शरीर उस यौवन की छत सा है जिसकी छाव में हर कोई पलना चाहता है
तुम्हारे यौवन को भी हर कोई पाना चाहता है । बस तुम पहाड़ से सुडौल से दिखते हो
तो जंगल में हवा है , तुम में लावा है , जो फुट सकता है ,
लेकिन मुझे लगता है तुम समुद्र से गहरे हो
पहाड़ से ऊंचे हो
तुम्हारी आंखे मुझ से मिलके मुझे मुझ से होने का एहसास करवाती है। (प्रेम संबंध ),

मुझे हजारो दफ़ा लगता है तुमने मेरी ओर देखा नही , कभी मुझे उन नजरो से समझा
नही (नजरिया)
मगर ये सच नही तुम समझते हो,  सब बस तुम
एक सिरे को दुज्जे से जुड़ने नही देते (आचरण)

प्रकृति ने तुम्हे सुंदर पहाड़ जैसा सुडौल शरीर दिया है । (बनावट)
तम्हारी शिखाएं गहरी घनी है  , ठीक उसी तरह जैसे प्रकर्ति ने हमे दी है (केश सज्जा)

तुम्हरी शाखाएं उसी तरह मजबूत है जैसे उस पर मानुष आ बैठे ओर तुम उसे अपने आगोश में भर लो (रिश्ते)
ओर यही अगर कोई उड़ता परिंदा हो तो तुम उसे बसेरे को जगह दे दो (दोस्ती)
तुम्हारे सुंदर कान हमेशा मेरी सुनते है , (धैर्य )

मगर ऐसा नही की तुम कुछ कहना नही चाहते । समुद्र सा रेत पे तुम भी बहना चाहते हो । (कहने को बहुत कुछ है )
तुम्हे पुरुष होने का घमंड नही (परवरिश) प्रकर्ति का  आड़े आ जाना स्वभाविक है ।

यूँ जो प्रकर्ति बदले तुम भी बदलो तुम भी पुरुष से पौरुष बन जाओ ।

वीर्य से उत्पन , नभ में पले , प्रकर्ति के स्वभाविक से बालक हो तुम पुरुष बंनने तक के सफर में स्त्री के सौभाग्य का कारण हो तुम
तुमसे बनी है

मिलकियत में कुछ स्वांग से हो तुम ।
कुछ पहाड़ से  , कुछ समुद्र से गहरे , कुछ गगन से ढूंढ़ले , कुछ धरा से सख्त , कुछ रेत से बिखरे
कुछ चंचल हवा से , उड़ते , मिलकियत वाले स्वांग हो तुम पुरुष  ।

तुम्हारा आवरण कठोर सा है ,
किन्तु भीतर से तुम बेहद लचीले से हो
तुम बिना साज सज्जा वाले फूल दान हो जिसकी चाहत हर घर की पहली जरूरत है
तुमसे हम सब है , इसमे कोई दो राय नही
पूरक है हम, ।

जब तुम सजते हो , मानो कायनाथ में तूफान से उठने वाला है , मन के अंदर हजारो सवाल खड़े हो उठते है , तुम्हारी दिशा तो ठीक है, कहीं ये स्वांग क्षणिक मात्र तो नही ....  कहीं कुछ अजीब सा है। (भय खो देने का )

जब तुम्हारे लबो से मुस्कुराहट उठती है , मानो बड़ी दाढ़ी के घने काले , सफेद बालों के भीतर  से प्रेम की अगुवाई होने को हो । (प्रेम)

आपार प्रेम और अथाह निर्लोभी संसार के पूरक हो तुम ।

तुम हो तो मुझे मेरा होने की अहमियत पता चलती है , तुमसे मेरे स्नेह और अपनत्व की भूख मिटती है ।
स्त्री को उसके स्त्री होने पर गर्व करवाने के लिये तुम हो
उसे उस जैसे ओर खुद को खुद जैसे रहने देने के लिए तुम हो

ज़िन्दगी के ढेर उतार चढ़ावो को समझने के लिये तुम पहाड़ से हो

मेरी गोद से निकले तुम्हारे कंधे पर चढ़े बालक के लिए तुम हो

मेरी अथाह पीड़ा के कारक भी तुम हो निवारण भी तुम हो (स्त्री का प्रसव काल का प्रारम्भ ओर अंत )

तुम हर रिश्ते में खुद से हो (पिता , पुत्र , भाई दोस्त , पति ) पुरुष हो तुम

तुम्हारे यौवन को श्रंगार की जरूरत नही फिर भी तुम समझ के स्तर का श्रंगार को ओढ़े हो ।
तुम हर दम प्रयास करते हो तुम्हारे कँधे किसी का सहारा न बने । तुम उमीदो पे खरे नही उतरते सही है.....

क्यों कि तुम उमीदो को बंनने नही देना चाहते , शायद तुम खुद सा मुझे चाहते हो सबल ।

(स्त्री और पुरुष की उमीदों का नाम)

पुरुषो पर इतना ही समझ पाई हुँ ।

पुरषो को उनका एक दिन मुबारक हो । वैसे कोई दिन खास नही । सब एक ही जैसे है , बस जन्मदिन की तरह है ये । जन्मदिन मुबारक हो
Dear male friends , family members ....
भाग 2

ज़िन्दगी की कलम से
हर तरह के पुरुष से सामना हुआ है ।
कुछ अच्छे कुछ बुरे कर्मों का ढ़िढोरा तो कहीं समाज का ।

पुरुष से अथाह प्रेम नही मगर कोई बेर भी नही ।

#हम
इनके  पैदा होने पर मोहले में खड़ी होकर ढोल बजना बन्द कर देंगी ,
फिर इनके लिए कभी पैदा होने के बाद के व्रत
तो कभी इनकी लम्बी उम्र के व्रत
या इनके पैदा होने पर ढेर सारा प्यार ननिहाल की तरफ से लेने पर
फिर बड़े होने पर एक गाड़ी लेने पर
या इन्हें खड़े होकर पेशाब करने से
इनके पैदा होने पर इन्हें
तुम लड़के हो रो नही सकते
तुम लड़के हो वो  लड़की
तुम दूध पियो घी खाओ जरूरी होता है
बर्तन , कपड़े धोने के काम लड़के नही करते
तुम कमा के लाओगे तभी घर चलेगा 
Good boy kbhi girls से लड़ाई नही करते
तुम भाई हो तुम्हे तुम्हारी बहन की रक्षा करनी है

ढेर सारे जुम्ले है , क़सीदे है , जो हम जैसी निर्मयी औरतो ने गढ़े है , इन्हें रोक लेते है
यकीन मानो पहाड़ से आदमी सख़्त नही कोमल पंखुड़ी से दिखने लगेंगे ।
पुरुष का सृजन किसी माँ ने तो किया है ।

#समाज से ऊपर उठ के देखो ।

बहुत सारा प्यार और स्नेह ।
है इस पुरुष में ।
जातीय टिपणी नही है , कुछ अपवाद हर जगह हैं।यकीन मानो में रोज ऐसे गलीचों से टकराती हूँ
जिनकि समझ के  कशीदे ,#जिस्मानी भूख वाले धागे से बुनी ,सुंदर फुलवारी से होते हैं  । जैसे हर फुलवारी मनमोहक नही होती , वैसे ही ये भी हैं।
बस अब जब भी प्रेमिका , माँ , बेटी , बहन या जो भी रिश्ता हो तुम्हारा जब भी कशीदे गढ़ो तो #मन के धागे से बुनना , #ज़िस्म तो रूह का साथ छोड़ता ही है  । इसमें किसी लिंग का दोष नही ।

👨पुरषो वाला ये दिन इन्हें मुबारक हो ।
ओर तुम्हे भी 👸








9/15/2017

Simran film review

12.8.2017

कंगना रनौत की फिल्म सिमरन को हंसल मेहता ने डायरेक्ट किया है। पूरी पटकथा कंगना के लीड रोल में (प्रफुल्ल)पर आधारित ।

फिल्म से प्यार न करो खुद से कर लो काफी है 

क्वीन वाला जादू तो फिर से देखने को मिल सकता है की नही ? कहूंगी जादू ढूंढने मत बैठ जाना बस जो है उसका आनन्द लेते आना ।

अपूर्व असरानी और कंगना रनौत ने कहानी को काफी साधारण सा रखा

कहानी की बात करूँ तो फिल्म में कंगना प्रफुल नाम की NRI गुजराती लड़की का किरदार निभा रही है ।
भारतीयों की मिथ्या को दूर करते हुए पूरी पटकथा में एक लड़की ड्राइविंग करते हुए ,पूरी कहानी का भार अपने कन्धों पे लिए आगे बढ़ रही है ,तुम्हे ये शायद ही पसन्द आये क्यों कि तुम्हे वो सिर्फ पिता पति पुत्र के प्रेम में लिपटी नजर आती है ।
कंगना की खास बात  "जैसी है वैसी ही है" कोई फेर बदलाव नही ओर यही सब से अलग करता अहि उन्हें  है,लम्बी पारी के लिए ये जरूरी भी है ।
प्रफुल्ल एक ऐसी लड़की जो मेरे ओर तुम्हारे जैसी है
"जिसे समाज के नियमो के झंडे को खुद की छाती पे लेकर गहने बना घूमने को कोई शोख़ नही "
समाज के बंधनों को नहीं मानती है और स्वतंत्र होकर जीती है वो समाज के बंधनों से आजादी चाहती है |
प्रफुल तलाकशुदा होने के बावजूद भी ब्वॉयफ्रेंड के साथ डेट पर जाती हैं। ओर साथ ही बिना सिक्योरिटी के सेक्स करने से मना भी कर देती है
*ओर आज की तारीख में ये पाप है तुम ऐसा कुछ कर दो तो तलाक की नोबत आन पड़े या तुम्हे ओर असहाय महसूस करवा दिया जाए तुम स्त्री हो ।* #रूढ़िवादिता #समाज
खेर इसके बाद के सीन को देख मुझे कहानी के इस पात्र से ओर प्यार हो गया ।
इसके अलावा उसे एक ओर बुरी लत है। ये लत चोरी और जुएं की लत जिसके बिना वो जी नहीं सकती। फिल्म में कंगना के किरदार के कई शेड्स देखने को मिलेंगे। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कंगना एक मंझी हुई कलााकर है ।
" कंगना कहती हैं कि लड़के पटाना कोई बुराई थोड़ी ना है ये तो टैलेंट होता है। "
कुल मिलाकर वो अपनी जिंदगी में आने वाली हर परिस्थिति से लड़ते हुये आगे बढ़ती है,  टेंशन नहीं लेती । अपनी चोरी और जुएं की लत की वजह से पुलिस की नजर में आती है ,फिर शुरू होता है मैं आगे आगे तुम पीछे2 ओर
फ़िर बाबा चु ....
सिनेमा जा आओ अब जरा https://youtu.be/rI8GhmfK6Jc
तुम्हे प्यार हो जायेगा
उस घुँघराले बालो वाली लड़की
मुस्कुराहट ओर जीने के अंदाज भर से ।
(प्रेम न हो तो तर्क देते हुए टिकट के 220 rs मुझ से लेना ) 😎
उसकी जगह खुद को देखते हुए तुम्हे नाचने का मन करेगा और फिर तुम थिरकते हुए बाहर आओगी ।
ओर #moralofstorytelling भूलते हुए फिर से एडजस्टमेंट वाले घर की चारदीवारी में घुस खुद से प्रेम करना भूल जाना #ग्रहणी #महिला #प्रेम =पति बच्चे और परिवार ।
#simran #without #raj is much butter ....

9/14/2017

हिन्दी दिवस

#राजस्थान की कंडे ,कोड़े किने, कठे कहण हारी काकी भी जाणे से आज टाबर स्कूल ते आतें बख्त गिफ्ट  में क्यों तो लावेंगे ।
लुगाइयां  ने आपणे भरतारूं सूं कह दी है खाली हाथ मना आइयो ।
सरकारी दफ्तर हारे भी आज तो समोसे के सागे हो रही प्रश्नोत्तरी में क्यों तो माल घरा ने लावेंगे । #हिन्दीदिवस #हिन्दीपखवाड़ा #सरकारी #मौज सरकारी सा प्रेम ।
प्राइवेट दफ़्तरं हारो हिन्दी दिवस मनाण की बात थाने कह दी जावे थे तो आपका बोनस के किडनी भी  छोड़ दोयोगे तब भी ना होगा थारे ताईं ।

8/12/2017

रुहसेरुहमुलाकात

एक गट्ठर रोज लिपट कर उलझ सा जाता है
ख्यालो की पोटली लिए अताह समुद्र की ओर बढ़ते जाता है ज़िन्दगी के अपने मायने ओर सुकून की अपनी तलाश अंतरिम  पड़ाव पर नजदीकी से महसूस करने के बाद भी #एकगट्ठर #ज़िन्दगी से लिपटा सा जाता है , हजार कोशिशो के बावजूद जोड़ तोड़ का सिलसिला यूँ ही मुकदर से लिपट कर खुद के आगोश में भरने को बड़ी बेशर्मी से बेसुध सा खड़ा नजर आता है वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है

एक गट्ठर अब जाल सा भुना नजर आता है
शामियाने में कुछ च्का चोंध सी नजर आती है
अपने अपनो से पराये होते और पराये अपनो से अपने
होते  नजर आते हैं चारदीवारी का प्यार गट्ठर में लिप्टा था अब हिस्सो में बंट कर तम्बू सा गड़ा नजर आता है

ज़िस्म के हिस्सों से उगले उबलते किस्सो से
इस गट्ठर का जिस्मानी रूहानी  रिश्ता रहा है
कहीं तो उबले किस्सो में कुछ गल गया होगा
गर्म में शकर ठंडे में नमक पिघलता है
ऐसा सोच गट्ठर कुछ तो हल्का होने की कवायद में
उलझ सा गया
वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है

वो मुलायम उंगलियों के सहारे अपने केशु की लट को
सवांरने की ख़ुशी कब उलझनों के गट्ठर सी हो गई उस मासूम को भी कहाँ पता था
नभ से जन्मी गगन को चूमती ,
धारा सी बहती ,
लहरों सी खुशी ,
सुमद्र सा दिल लिए ,
हवाओं से दोस्ती करती हुई दीवारों को चीरती हुई
उस पार एक समान सम्मान से बहने को बढ़ने को ततपर
चिड़िया सी चुलबुल बाघ से चक्षु लिए
बुलबुल सी मीठी कोयल सी काली
अग्नि सा तेज धैर्य सी रफ्तार
लिए #ज़िन्दगी
वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है
#रुहसेरुहक़ीरुहानीसीमुलाकतें

4/17/2017

अजान की तीखी भजन की माला सोनू निगम

आज सुबह भोर को सोनू निगम की नींद में खलल डालते लाउडस्पीकर नजर आ गए
और उन्हों ने ट्वीट कर के लोगो को चाय पर चर्चा का मुदा दे दिया बात यूँ है कि उनके ट्वीट के अनुसार वो कफा है अजान और भक्ति के इलेक्ट्रॉनिक भाव से उनके अनुसार अजान लाउडस्पीकर पे सब को सुनाई जाये ये कही नही लिखा
इबादत का ढिंढोरा पिटा जाये ये जरुरी नही इबादत के और भी अनेक तरीके है

लाउडस्पीकर पर अजान से सिंगर सोनू निगम की नींद टूट गई. सोमवार सुबह बेहद गुस्से में उन्हें चार ट्वीट किए. उन्होंने लिखा कि मैं मुसलमान नहीं हूं, लेकिन मुझे अज़ान की आवाज़ से सुबह उठना पड़ता है. यह ‘थोपी हुई धार्मिकता’ कब खत्म होगी
हालांकि उन्होंन अपने अगले ट्वीट मे
साफ कर दिया था कि मंदिर और गुरुद्वारों के संबंध में भी उनके यही विचार हैं. उन्होंने लिखा था
‘मैं ऐसे किसी भी मंदिर या गुरुद्वारे में यकीन नहीं रखता तो धर्म में यकीन न रखने वाले लोगों को जगाने के लिए बिजली का इस्तेमाल करता हो ।

ट्वीट
1.
भगवान सबका ख्याल रखे. मैं मुसलमान नहीं हूं, लेकिन मुझे अज़ान की आवाज़ से उठना पड़ता है. ये थोपी हुई धार्मिकता भारत में कब खत्म होगी.
2.
और बाय द वे मोहम्मद ने जब इस्लाम बनाया था तब बिजली थी ही नहीं. मुझे एडिसन के बाद मुझे ये कर्कश आवाज क्यों सुननी पड़ती है?
3.
मैं ऐसे किसी भी मंदिर या गुरुद्वारे में यकीन नहीं रखता तो धर्म में यकीन न रखने वाले लोगों को जगाने के लिए बिजली का इस्तेमाल करता हो. फिर क्यों? ईमानदार? सच्चा?
4.
गुंडागर्दी है बस…

सोनू के गुस्से को कुछ लोग इस्लाम के अपमान से जोड़कर ले उड़े तो कुछ राईट व् लेफ्ट के विंग के महान लोग तो गालिया भी देने पे उतर गए
सोनू निगम की नींद में खलल डालते लाउडस्पीकर नजर क्या  आ गए लोगो के जल गई बहुत से बार हम सब की अंतर्मन  में यही सवाल होते ह की इन्हें कोई बन्द क्यों नही करवाता अपना भक्ति भाव आप अपने मुंह से गा  कर खुद को सुनाये या अपने पांच लोगो को क्यों 50 तक आवाज पहुंचानी होती है बहुत सी बार हिन्दू हो या मुस्लिम या सिख मंदिरों के पास घर नही लेते क्यों की आप की एक निजी जिंदगी भी है जिसमे आप बाहर का शोर नही चाहते भारत में हर तरह के लोग है और उनकी अपनी पसंद भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक सवाल उठाती है और लोग 2 विंग में बंट जाते है
इबादत का ढिंढोरा पिटा जाये ये जरुरी नही इबादत के और भी अनेक तरीके है इबादत दो लोगो के बीच की बातचीत जैसा कुछ है मगर हम 50 को इकठ्ठा कर ले जाना चाहते है जैसे भगवान को रिश्व्त दी जा रही हो एक के साथ 50 %फ्री । अंध भक्ति के लाउडस्पीकर को किसी एक दिन तो फटना ही होगा
भक्ति के भाव में निगम को अनेक ट्वीट मिले लोगो ने कहा माँ का लाडला सो रहा है नींद न उड़े इसलिये मत बजाओ ।
मजहब के धर्म को मन की आवाज समझ आती ह की लाउडस्पीकर की ये बात देखने वाली होगी
वही कुछ लोग इसे राजनीती से जोड़ कर भी देख रहे है
बहरहाल अब तक ट्रेन्ड में सोनू निगम की डिमांड है

क्यों की ये सब भक्तो सुबह की  नींद में हुआ तो अब तुम अगले ट्वीट में माफ़ी की उमीद भी रख रहे हो नाश्ते की चर्चा के बाद शाम के खाने पे माफ़ी भरे ट्वीट भी शायद भक्तो की प्लेट में हो

ट्विटर वाली चिड़िया