Happy international men's day 😇
ज़िन्दगी की कलम से भाग 1
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज पुरुषो का दिन है ।
बधाई हो उन सभी को जो पुरुष है मेरी ज़िंदगी में उन्हें भी जो नही है , उन्हें भी ।
पिता से शुरू करूँ तुम मेरे प्रिय हो तुमसे मैंने जन्म लिया है , तुमसे शुरू होकर में से .....मैं का सफर बनाया है मैंने | तुम्हें पुरषो वाला ये दिन मुबारक हो ।
मैंने रोते बिल्खतें पुरुषो में से एक तुम्हे देखा है ,आज तुम्हे ख़ुद में ख़ुद से देखा है ।
कहने को तुम आदमी हो , आदम हो कहते है
मर्द रोते नही , मैने तुम्हे तिल तिल तड़पडते देखा है
उनकी सिसकियाँ सरे बाजार नही बिकती , मैंने तुन्हें बिकते देखा है ।
मर्द अक्सर टूट जाया करते है , ओर हम उन्हें आदम बना जोड़ देते है ।
उंनकी सिसकियाँ नामर्दो की बारात में गिनती कर हम जुलूस निकाला करते हैं
मर्द को दर्द नही होता , ये कहकर हम ठहाके लगवयां करते हैं ...
तुम्हे पुरुष हो ऐसी नजरों से मैंने कभी देखा नही
एक स्वांग सा है रिश्तो का तुम्हे तुम सा किसी ने देखा नही
तुम्हे तुम से रहने दे कोई ऐसा किसी ने सोचा नही
तुम्हारी खूबसूरती का किस्सो का फतवा किसी ने गढ़ा नही ।
तो आओ तुम्हे भी तुम सा रहने देने की एक कोशिश करती हूं ।
पिता को भूल पुरुष से मुलाकात करती हूँ ।
कुछ बुनती हूँ किस्सो से , कुछ गढ़ती हुँ हिस्सो से
कुछ तुम में भी खास है , जिसकी कल्पना मात्र से तुम्हारी खूबसूरती मेरी आँखों में उतर आई है।
तुम मम प्रिय पौरुष पुरुष
तुम्हारा कद उस चोटी सा है , जिसकी जड़ें धरती से जुड़ी है
तुम्हारा सुंदर शरीर उस यौवन की छत सा है जिसकी छाव में हर कोई पलना चाहता है
तुम्हारे यौवन को भी हर कोई पाना चाहता है । बस तुम पहाड़ से सुडौल से दिखते हो
तो जंगल में हवा है , तुम में लावा है , जो फुट सकता है ,
लेकिन मुझे लगता है तुम समुद्र से गहरे हो
पहाड़ से ऊंचे हो
तुम्हारी आंखे मुझ से मिलके मुझे मुझ से होने का एहसास करवाती है। (प्रेम संबंध ),
मुझे हजारो दफ़ा लगता है तुमने मेरी ओर देखा नही , कभी मुझे उन नजरो से समझा
नही (नजरिया)
मगर ये सच नही तुम समझते हो, सब बस तुम
एक सिरे को दुज्जे से जुड़ने नही देते (आचरण)
प्रकृति ने तुम्हे सुंदर पहाड़ जैसा सुडौल शरीर दिया है । (बनावट)
तम्हारी शिखाएं गहरी घनी है , ठीक उसी तरह जैसे प्रकर्ति ने हमे दी है (केश सज्जा)
तुम्हरी शाखाएं उसी तरह मजबूत है जैसे उस पर मानुष आ बैठे ओर तुम उसे अपने आगोश में भर लो (रिश्ते)
ओर यही अगर कोई उड़ता परिंदा हो तो तुम उसे बसेरे को जगह दे दो (दोस्ती)
तुम्हारे सुंदर कान हमेशा मेरी सुनते है , (धैर्य )
मगर ऐसा नही की तुम कुछ कहना नही चाहते । समुद्र सा रेत पे तुम भी बहना चाहते हो । (कहने को बहुत कुछ है )
तुम्हे पुरुष होने का घमंड नही (परवरिश) प्रकर्ति का आड़े आ जाना स्वभाविक है ।
यूँ जो प्रकर्ति बदले तुम भी बदलो तुम भी पुरुष से पौरुष बन जाओ ।
वीर्य से उत्पन , नभ में पले , प्रकर्ति के स्वभाविक से बालक हो तुम पुरुष बंनने तक के सफर में स्त्री के सौभाग्य का कारण हो तुम
तुमसे बनी है
मिलकियत में कुछ स्वांग से हो तुम ।
कुछ पहाड़ से , कुछ समुद्र से गहरे , कुछ गगन से ढूंढ़ले , कुछ धरा से सख्त , कुछ रेत से बिखरे
कुछ चंचल हवा से , उड़ते , मिलकियत वाले स्वांग हो तुम पुरुष ।
तुम्हारा आवरण कठोर सा है ,
किन्तु भीतर से तुम बेहद लचीले से हो
तुम बिना साज सज्जा वाले फूल दान हो जिसकी चाहत हर घर की पहली जरूरत है
तुमसे हम सब है , इसमे कोई दो राय नही
पूरक है हम, ।
जब तुम सजते हो , मानो कायनाथ में तूफान से उठने वाला है , मन के अंदर हजारो सवाल खड़े हो उठते है , तुम्हारी दिशा तो ठीक है, कहीं ये स्वांग क्षणिक मात्र तो नही .... कहीं कुछ अजीब सा है। (भय खो देने का )
जब तुम्हारे लबो से मुस्कुराहट उठती है , मानो बड़ी दाढ़ी के घने काले , सफेद बालों के भीतर से प्रेम की अगुवाई होने को हो । (प्रेम)
आपार प्रेम और अथाह निर्लोभी संसार के पूरक हो तुम ।
तुम हो तो मुझे मेरा होने की अहमियत पता चलती है , तुमसे मेरे स्नेह और अपनत्व की भूख मिटती है ।
स्त्री को उसके स्त्री होने पर गर्व करवाने के लिये तुम हो
उसे उस जैसे ओर खुद को खुद जैसे रहने देने के लिए तुम हो
ज़िन्दगी के ढेर उतार चढ़ावो को समझने के लिये तुम पहाड़ से हो
मेरी गोद से निकले तुम्हारे कंधे पर चढ़े बालक के लिए तुम हो
मेरी अथाह पीड़ा के कारक भी तुम हो निवारण भी तुम हो (स्त्री का प्रसव काल का प्रारम्भ ओर अंत )
तुम हर रिश्ते में खुद से हो (पिता , पुत्र , भाई दोस्त , पति ) पुरुष हो तुम
तुम्हारे यौवन को श्रंगार की जरूरत नही फिर भी तुम समझ के स्तर का श्रंगार को ओढ़े हो ।
तुम हर दम प्रयास करते हो तुम्हारे कँधे किसी का सहारा न बने । तुम उमीदो पे खरे नही उतरते सही है.....
क्यों कि तुम उमीदो को बंनने नही देना चाहते , शायद तुम खुद सा मुझे चाहते हो सबल ।
(स्त्री और पुरुष की उमीदों का नाम)
पुरुषो पर इतना ही समझ पाई हुँ ।
पुरषो को उनका एक दिन मुबारक हो । वैसे कोई दिन खास नही । सब एक ही जैसे है , बस जन्मदिन की तरह है ये । जन्मदिन मुबारक हो
Dear male friends , family members ....
भाग 2
ज़िन्दगी की कलम से
हर तरह के पुरुष से सामना हुआ है ।
कुछ अच्छे कुछ बुरे कर्मों का ढ़िढोरा तो कहीं समाज का ।
पुरुष से अथाह प्रेम नही मगर कोई बेर भी नही ।
#हम
इनके पैदा होने पर मोहले में खड़ी होकर ढोल बजना बन्द कर देंगी ,
फिर इनके लिए कभी पैदा होने के बाद के व्रत
तो कभी इनकी लम्बी उम्र के व्रत
या इनके पैदा होने पर ढेर सारा प्यार ननिहाल की तरफ से लेने पर
फिर बड़े होने पर एक गाड़ी लेने पर
या इन्हें खड़े होकर पेशाब करने से
इनके पैदा होने पर इन्हें
तुम लड़के हो रो नही सकते
तुम लड़के हो वो लड़की
तुम दूध पियो घी खाओ जरूरी होता है
बर्तन , कपड़े धोने के काम लड़के नही करते
तुम कमा के लाओगे तभी घर चलेगा
Good boy kbhi girls से लड़ाई नही करते
तुम भाई हो तुम्हे तुम्हारी बहन की रक्षा करनी है
ढेर सारे जुम्ले है , क़सीदे है , जो हम जैसी निर्मयी औरतो ने गढ़े है , इन्हें रोक लेते है
यकीन मानो पहाड़ से आदमी सख़्त नही कोमल पंखुड़ी से दिखने लगेंगे ।
पुरुष का सृजन किसी माँ ने तो किया है ।
#समाज से ऊपर उठ के देखो ।
बहुत सारा प्यार और स्नेह ।
है इस पुरुष में ।
जातीय टिपणी नही है , कुछ अपवाद हर जगह हैं।यकीन मानो में रोज ऐसे गलीचों से टकराती हूँ
जिनकि समझ के कशीदे ,#जिस्मानी भूख वाले धागे से बुनी ,सुंदर फुलवारी से होते हैं । जैसे हर फुलवारी मनमोहक नही होती , वैसे ही ये भी हैं।
बस अब जब भी प्रेमिका , माँ , बेटी , बहन या जो भी रिश्ता हो तुम्हारा जब भी कशीदे गढ़ो तो #मन के धागे से बुनना , #ज़िस्म तो रूह का साथ छोड़ता ही है । इसमें किसी लिंग का दोष नही ।
👨पुरषो वाला ये दिन इन्हें मुबारक हो ।
ओर तुम्हे भी 👸
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