8/12/2017

रुहसेरुहमुलाकात

एक गट्ठर रोज लिपट कर उलझ सा जाता है
ख्यालो की पोटली लिए अताह समुद्र की ओर बढ़ते जाता है ज़िन्दगी के अपने मायने ओर सुकून की अपनी तलाश अंतरिम  पड़ाव पर नजदीकी से महसूस करने के बाद भी #एकगट्ठर #ज़िन्दगी से लिपटा सा जाता है , हजार कोशिशो के बावजूद जोड़ तोड़ का सिलसिला यूँ ही मुकदर से लिपट कर खुद के आगोश में भरने को बड़ी बेशर्मी से बेसुध सा खड़ा नजर आता है वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है

एक गट्ठर अब जाल सा भुना नजर आता है
शामियाने में कुछ च्का चोंध सी नजर आती है
अपने अपनो से पराये होते और पराये अपनो से अपने
होते  नजर आते हैं चारदीवारी का प्यार गट्ठर में लिप्टा था अब हिस्सो में बंट कर तम्बू सा गड़ा नजर आता है

ज़िस्म के हिस्सों से उगले उबलते किस्सो से
इस गट्ठर का जिस्मानी रूहानी  रिश्ता रहा है
कहीं तो उबले किस्सो में कुछ गल गया होगा
गर्म में शकर ठंडे में नमक पिघलता है
ऐसा सोच गट्ठर कुछ तो हल्का होने की कवायद में
उलझ सा गया
वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है

वो मुलायम उंगलियों के सहारे अपने केशु की लट को
सवांरने की ख़ुशी कब उलझनों के गट्ठर सी हो गई उस मासूम को भी कहाँ पता था
नभ से जन्मी गगन को चूमती ,
धारा सी बहती ,
लहरों सी खुशी ,
सुमद्र सा दिल लिए ,
हवाओं से दोस्ती करती हुई दीवारों को चीरती हुई
उस पार एक समान सम्मान से बहने को बढ़ने को ततपर
चिड़िया सी चुलबुल बाघ से चक्षु लिए
बुलबुल सी मीठी कोयल सी काली
अग्नि सा तेज धैर्य सी रफ्तार
लिए #ज़िन्दगी
वो गट्ठर अब ओर भारी सा नजर आता है
#रुहसेरुहक़ीरुहानीसीमुलाकतें

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